Saturday, 1 September 2012

// नारी //



देहलीज़ तो देहलीज़ थी ,
कभी लांग न पाई वो ///

कभी खुले आकाश में ,
उड़ न पाई वो ///

कभी गिरी, कभी उठी ,
कभी सहमी रही वो ///

दो कदम भी अपने कदम से ,
चल न पाई वो ///

करती रही सब के लिए सब कुछ ,
पर दुनिया हे बड़ी शातिर ये समझ न पाई वो ///

ख्वाब बुने थे कुछ ,
सपने देखे थे उसने भी ///

केसे टूटे,केसे बिखरे 
ये समझ न पाई वो ///

कभी माँ ...कभी बहन ...
कभी बीवी बनी वो ...

ये दर या वो दर ,
हे कौनसा उसका घर??
 ये समझ न पाई वो ///

देहलीज़ तो देहलीज़ थी ,
कभी लांग न पाई वो ///

~विपुल ~

8 comments:

  1. वाकई विपुल ...
    यह और ही है जिसने सब कुछ सहा , हमारे लिए !
    प्रभावशाली कलम के लिए बधाई और शुभकामनायें !

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  2. बहुत सुन्दर रचना विपुल.....

    अनु

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  3. मार्मिक ... भावपूर्ण रचना .. नारी की की इस दशा के लिए पुरुष ही जिम्मेवार है ... कमाल की अभिव्यक्ति ...

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  4. बहुत ही मार्मिक रचना..

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  5. अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार

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